मूल श्लोक
नभः स्पृशं दीप्तमनेकवर्णम्व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्माधृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
nabhaḥ spṛśaṃ dīptamanekavarṇam vyāttānanaṃ dīptaviśālanetram dṛṣṭvā hi tvāṃ pravyathitāntarātmā dhṛtiṃ na vindāmi śamaṃ ca viṣṇo
अनुवाद
आकाश से भिड़े हुए, प्रकाशमान, अनेक रंगों के, जबड़े फैलाए हुए और बड़े चमकीले नेत्रों से युक्त तुमको देख कर अन्तरात्मा घबड़ा गया है; इससे हे विष्णो! मेरा धीरज छूट गया और शान्ति भी जाती रही!