मूल श्लोक
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
anantaścāsmi nāgānāṃ varuṇo yādasāmaham pitṝṇāmaryamā cāsmi yamaḥ saṃyamatāmaham
अनुवाद
नागों में अनन्त मैं हूँ; यादस् अर्थात् जलचर प्राणियों में वरुण; और पितरों में अर्यमा मैं हूँ; मैं नियमन करनेवालों में यम हूँ।
टिप्पणी
वासुकि =सर्पों का राजा और अनन्त = 'शेष' ये अर्थ निश्चित है और अमरकोश तथा महाभारत में भी यही अर्थ दिए गए है (देखो मभा॰ आदि 35 – 39) परन्तु निश्चयपूर्वक नहीं बतलाया जा सकता, कि नाग और सर्प में क्या भेद है। महाभारत के आस्ति क-उपाख्यान में इन शब्दों का प्रयोग समानार्थक ही है। तथापि जान पड़ता है, कि यहाँ पर सर्प और नाग शब्दों से सर्प के साधारण वर्ग की दो भिन्न-भिन्न जातियाँ विवक्षित है। श्रीधरी टीका में सर्प को विषैला और नाग को विषहीन कहा है, एवं रामानुजभाष्य में सर्प को एक सिर वाला और नाग को अनेक सिरों वाला कहा है। परन्तु ये दोनों भेद ठीक नहीं जँचते। क्योंकि कुछ स्थलों पर, नागों के ही प्रमुख कुल बतलाते हुए उन में अनन्त और वासुकि को पहले गिनाया है और वर्णन किया है, कि दोनों ही अनेक सिरों वाले एवं विषधर हैं किन्तु अनन्त है अग्नि वर्ण का और वासुकि है पीला। भागवत का पाठ गीता के समान ही है।
— Lokmanya Tilak