भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १०.२२ ·

English

मूल श्लोक

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

vedānāṃ sāmavedo'smi devānāmasmi vāsavaḥ indriyāṇāṃ manaścāsmi bhūtānāmasmi cetanā

१०.२२अध्याय १० · विभूतियोग४२ में से श्लोक २२

अनुवाद

मैं वेदों में सामवेद हूँ; देवताओं में इन्द्र हूँ और इन्द्रियों में मन हूँ; भूतों में चेतना अर्थात् प्राण की चलन-शक्ति मैं हूँ।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

यहाँ वर्णन है, कि मैं वेदों में सामवेद हूँ, अर्थात् सामवेद मुख्य है; ठीक ऐसी ही महाभारत के अनुशासन पर्व (14.317) में भी 'सामवेदश्च वेदानां यजुषां शतरुद्रियम्' कहा है। पर अनुगीता में 'ॐकारः सर्वेदानाम्' (अश्व॰ 44.6) इस प्रकार, सब वेदों में ॐकार को ही श्रेष्ठता दी है; तथा पहले गीता (7.8) में भी 'प्रणवः सर्वेदेषु' कहा है। गीता 9.17 के 'ऋक्साम यजुरेव च' इस वाक्य में सामवेद की अपेक्षा ऋग्वेद को अग्रस्थान दिया गया है, और साधारण लोगों की समझ भी ऐसी ही है। इन परस्पर-विरोधी वर्णनों पर कुछ लोगों ने अपनी कल्पना को खूब सरपट दौड़ाया है। छान्दोग्य उपनिषद् में ॐकार ही का नाम उद्गीथ है और लिखा है, कि 'यह उद्गीथ सामवेद का सार है और सामवेद ऋग्वेद का सार है' (छां॰ 1.1.2)। सब वेदों में कौन वेद श्रेष्ठ है, इस विषय के भिन्न-भिन्न उक्त विधानों को मेल छान्दोग्य के इस वाक्य से हो सकता है। क्योंकि सामवेद के मन्त्र भी मूल ऋग्वेद से ही लिए गए हैं। पर इतने ही से सन्तुष्ट न होकर कुछ लोग कहते है, कि गीता में सामवेद को यहाँ पर जो प्रधानता दी गई है, इसका कुछ न कुछ गूढ कारण होना चाहिए। यद्यपि छान्दोग्य उपनिषद् में सामवेद को प्रधानता दी है, तथापि मनु ने कहा है कि 'सामवेद की ध्वनि अशुचि है' (मनु॰ 4.124)। अतः एक ने अनुमान किया है, कि सामवेद को प्रधानता देने वाली गीता मनु से पहले की होगी; इसी से उसने यहाँ पर सामवेद को प्रधानता दी होगी। परन्तु हमारी समझ में 'मैं वेदों में सामवेद हूँ' इसकी उपपत्ति लगाने के लिए इतनी दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। भक्तिमार्ग में परमेश्वर की गानयुक्त स्तुति को सदैव प्रधानता दी जाती है। उदाहरणार्थ, नारायणीय धर्म में नारद ने भगवान का वर्णन किया है कि 'वेदेषु सपुराणेषु सांगोपांगेषु गीयसे' (मभा॰ शां॰ 334.23), और वसु राजा 'जप्यं जगौ' – जप्य गाता था (देखो शां 337.27 और 342.70 और 81) – इस प्रकार 'गै' धातु का ही प्रयोग फिर किया गया है। अतएव भक्ति -प्रधान धर्म में, यज्ञ-याग आदि क्रियात्मक वेदों की अपेक्षा, गान-प्रधान वेद अर्थात् सामवेद को अधिक महत्त्व दिया गया हो, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं; और 'मैं वेदों में सामवेद हूँ' इस कथन का हमारे मत में सीधा और सहज कारण यही है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय १०, श्लोक १०.२२