भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १.२४ ·

English

मूल श्लोक

सञ्जय उवाच ।एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

sañjaya uvāca evamukto hṛṣīkeśo guḍākeśena bhārata senayorubhayormadhye sthāpayitvā rathottamam

१.२४अध्याय १ · अर्जुनविषादयोग४७ में से श्लोक २४

अनुवाद

हे धृतराष्ट्र! गुडाकेश अर्थात् आलस्य को जीतने वाले अर्जुन के इस प्रकार कहने पर हृषीकेश अर्थात् इन्द्रियों के स्वामी श्रीकृष्ण ने (अर्जुन के) उत्तम रथ को दोनों सेनाओं के मध्यभाग में लाकर खड़ा कर दिया; और –

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

हृषीकेश और गुडाकेश शब्दों के जो अर्थ ऊपर दिए गए है, वे टीकाकारों के मतानुसार हैं। नारदपंचरात्र में भी 'हृषीकेश' की यह निरुक्ति है, कि हृषीक = इन्द्रियाँ और उनका ईश = स्वामी (ना॰ पंच॰ 5.8.17); और अमरकोश पर क्षीरस्वामी की जो टीका है उसमें लिखा है, कि हृषीक (अर्थात् इन्द्रियाँ) शब्द हृष् = आनन्द देना, इस धातु से बना है। इन्द्रियाँ मनुष्य को आनन्द देती हैं, इसलिए उन्हें हृषीक कहते है। तथापि, यह शंका होती है कि हृषीकेश और गुडाकेश का जो अर्थ दिया गया है, वह ठीक है या नहीं। क्योंकि हृषीक (अर्थात् इन्द्रियाँ) और गुडाका (अर्थात् निद्रा या आलस्य) ये शब्द प्रचलित नहीं है। हृषीकेश और गुडाकेश इन दोनों शब्दों की व्युत्पत्ति दूसरी रीति से भी लग सकती है। हृषीक + ईश और गुडाका + ईश के बदले हृषी + केश और गुडा + केश ऐसा भी पदच्छेद किया जा सकता है; और फिर यह अर्थ हो सकता है कि हृषीकेश अर्थात् हर्ष से खड़े हुए या प्रशस्त जिसके केश (बाल) हैं, वह श्रीकृष्ण, और गुडा अर्थात् गूढ़ या घने जिसके केश है, वह अर्जन। भारत के टीकाकार नीलकण्ठ ने गुडाकेश का यह अर्थ, गी॰10.20 पर अपनी टीका में विकल्प से सूचित किया है; और सूत के बाप का जो रोमहर्षण नाम है, उससे हृषीकेश शब्द की उल्लिखित दूसरी व्युत्पत्ति को भी असम्भवनीय नहीं कह सकते। महाभारत के शान्तिपर्वान्तर्गत नारायणीयोपाख्यान में विष्णु के मुख्य-मुख्य नामों की निरुक्ति देते हुए यह अर्थ किया है कि हृषी अर्थात् आनन्ददायक और केश अर्थात् किरण, और कहा है कि सूर्य-चन्द्र-रूप अपनी विभूतियों की किरणों से समस्त जगत को हर्षित करता है, इसलिए उसे हृषीकेश कहते है (शान्ति . 341.46)। इनमें कोई भी अर्थ क्यों न लें, पर श्रीकृष्ण और अर्जुन के ये नाम रखे जाने के, सभी अंशों में, योग्य कारण बतलाए जा नहीं सकते। लेकिन यह दोष नैरुक्ति कों का नहीं है। जो व्यक्ति वाचक या विशेष नाम अत्यन्त रूढ हो गए हैं, उनकी निरुक्ति बतलाने में इस प्रकार की अड़चनों का आना या मतभेद हो जाना बिलकुल सहज बात है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय १, श्लोक १.२४