मूल श्लोक
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ।संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
śubhāśubhaphalairevaṃ mokṣyase karmabandhanaiḥ saṃnyāsayogayuktātmā vimukto māmupaiṣyasi
अनुवाद
इस प्रकार बर्तने से (कर्म करके भी) कर्मों के शुभ-अशुभ फलरूप बन्धनों से तू मुक्त रहेगा, और (कर्मफलों के) संन्यास करके इस योग से युक्तात्मा अर्थात् शुद्ध अन्तःकरण होकर मुक्त हो जाएगा एवं मुझ में मिल जाएगा।
टिप्पणी
इससे प्रगट होगा है, कि भगवद्भक्त भी कृष्णार्पणबुद्धि से समस्त कर्म करें, उन्हें छोड़ न दे। इस दृष्टि से ये दोनों श्लोक महत्त्व के है। 'ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः' यह ज्ञान-यज्ञ का तत्त्व है (गी॰ 4.24), इसे ही भक्ति की परिभाषा के अनुसार इस श्लोक में बतलाया है (देखो गीतार॰ पृ. 430 और 431)। तीसरे ही अध्याय में अर्जुन से कह दिया है कि 'मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्य' (गी॰ 3.30) – मुझ में सब कर्मों का संन्यास करके – युद्ध कर; और पाँचवें अध्याय में फिर कहा है, कि 'ब्रह्म में कर्मों को अर्पण करके संगरहित कर्म करनेवाले के, कर्म का लेप नहीं लगता' (5.10)। गीता के मतानुसार यही यथार्थ संन्यास है (गी॰ 18.2)। इस प्रकार अर्थात् कर्मफलाशा छोड़कर (संन्यास) सब कर्मों को करनेवाला पुरुष ही 'नित्यसंन्यासी' है (गी॰ 5.3); कर्मत्यागरूप संन्यास गीता को सम्मत नहीं है। पीछे अनेक स्थलों पर कह चुके है कि इस रीति से किए हुए कर्म मोक्ष के लिए प्रतिबन्धक नहीं होते (गी॰ 2.64; 3.19; 4.23; 5.12; 6.1; 8.7), और इस 28 वें श्लोक में उसी बात को फिर कहा गया है। भागवतपुराण में ही नृसिंहरूप भगवान ने प्रह्लाद को यह उपदेश किया है कि 'मय्यावेश्य मनस्तात कुरु कर्मणि मत्परः' – मुझमें चित्त लगा कर सब काम किया कर (भाग॰ 7.10.23), और आगे एकादश स्कन्ध में भक्तियोग का यह तत्त्व बतलाया है, कि भगवद्भक्त सब कर्मों को नारायणार्पण कर दे (देखो भाग॰ 11.2.36 और 11.11.24)। इस अध्याय के आरम्भ में वर्णन किया है कि भक्ति का मार्ग सुखकारक और सुलभ है। अब उसके समत्वरूपी दूसरे बड़े और विशेष गुण का वर्णन करते है –
— Lokmanya Tilak