भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ८.२८ ·

English

मूल श्लोक

वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

vedeṣu yajñeṣu tapaḥsu caiva dāneṣu yatpuṇyaphalaṃ pradiṣṭam atyeti tatsarvamidaṃ viditvā yogī paraṃ sthānamupaiti cādyam

८.२८अध्याय ८ · अक्षरब्रह्मयोग२८ में से श्लोक २८

अनुवाद

इसे (उक्त तत्त्व को) जान लेने से वेद, यज्ञ, तप और दान में जो पुण्य-फल बतलाता है, (कर्म-) योगी उस सब को छोड़ जाता है और उसके परे आद्यस्थान को पा लेता है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

जिस मनुष्य ने देवयान और पितृयाण दोनों के तत्त्व को जान लिया – अर्थात् यह ज्ञात कर लिया, कि देवयान मार्ग से मोक्ष मिल जाने पर फिर पुनर्जन्म नहीं मिलता, और पितृयाण मार्ग स्वर्गप्रद हो तो भी मोक्षप्रद नहीं है – वह इनमें से अपने सच्चे कल्याण के मार्ग का ही स्वीकार करेगा; वह मोह से निम्न श्रेणी के मार्ग को स्वीकार न करेगा। इसी बात को लक्ष्य कर पहले श्लोक में 'इन दोनों सृती अर्थात् मार्गों को (तत्त्वतः) जानने वाला' ये शब्द आए है। इन श्लोकों का भावार्थ यों है – कर्मयोगी जानता है, कि देवयान और पितृयाण दोनों मार्ग में से कौन मार्ग कहा जाता है तथा इसी में से जो मार्ग उत्तम है, उसे ही वह स्वभावतः स्वीकार करता है। एवं स्वर्ग के आवागमन से बच कर इससे परे मोक्ष-पद की प्राप्ति कर लेता है। और 27 वें श्लोक में तदनुसार व्यवहार करने का अर्जुन को उपदेश भी किया गया है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय ८, श्लोक ८.२८