मूल श्लोक
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
bhūtagrāmaḥ sa evāyaṃ bhūtvā bhūtvā pralīyate rātryāgame'vaśaḥ pārtha prabhavatyaharāgame
अनुवाद
हे पार्थ! भूतों का यही समुदाय (इस प्रकार) बार-बार उत्पन्न होकर अवश होता हुआ, अर्थात् इच्छा हो या न हो, रात होते ही लीन हो जाता है और दिन होने पर (फिर) जन्म लेता है।
टिप्पणी
अर्थात् पुण्य कर्मों से नित्य ब्रह्मलोकवास प्राप्त भी हो जाएँ, तो भी प्रलय-काल में ब्रह्मलोक ही का नाश हो जाने से फिर नए कल्प के आरम्भ में प्राणियों का जन्म लेना नहीं छूटता। इससे बचने के लिए जो एक ही मार्ग है, उसे बतलाते है –
— Lokmanya Tilak