भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ७.३० ·

English

मूल श्लोक

साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

sādhibhūtādhidaivaṃ māṃ sādhiyajñaṃ ca ye viduḥ prayāṇakāle'pi ca māṃ te viduryuktacetasaḥ

७.३०अध्याय ७ · ज्ञानयोग३० में से श्लोक ३०

अनुवाद

और अधिभूत, अधिदैव एवं अधियज्ञ सहित (अर्थात् इस प्रकार, कि मैं ही सब हूँ) जो मुझे जानते हैं, वे युक्तचित्त (होने के कारण) मरण-काल में भी मुझे जानते हैं।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

अगले अध्याय में अध्यात्म, अभिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ का निरूपण किया है। धर्मशास्त्र का और उपनिषदों का सिद्धान्त है, कि मरणकाल में मनुष्य के मन में जो वासना प्रबल रहती है, उसके अनुसार उसे आगे जन्म मिलता है; इस सिद्धान्त को लक्ष्य करके अन्तिम श्लोक में 'मरणकाल में भी' शब्द हैं; तथापि उक्त श्लोक में 'भी' पद से स्पष्ट होता है, कि मरने से प्रथम परमेश्वर का पूर्ण ज्ञान हुए बिना केवल अन्तकाल में ही यह ज्ञान नहीं हो सकता (देखो गी॰ 2.72)। विशेष विवरण अगले अध्याय में है। कह सकते है, कि इन दो श्लोकों में अधिभूत आदि शब्दों से आगे के अध्याय की प्रस्तावना ही की गई है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय ७, श्लोक ७.३०