भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ६.४७ ·

English

मूल श्लोक

योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

yogināmapi sarveṣāṃ madgatenāntarātmanā śraddhāvānbhajate yo māṃ sa me yuktatamo mataḥ

६.४७अध्याय ६ · अध्यात्मयोग४७ में से श्लोक ४७

अनुवाद

तथापि सब (कर्म) योगियों में भी मैं उसे ही सब से उत्तम युक्त अर्थात् उत्तम सिद्धि कर्मयोगी समझता हूँ कि जो मुझ में अन्तःकरण रख कर श्रद्धा से मुझ को भजता है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इस श्लोक का यह भावार्थ है, कि कर्मयोग में भी भक्ति का प्रेम-पूरित मेल हो जाने से, यह योगी भगवान को अत्यन्त प्रिय हो जाता है; इसका यह अर्थ नहीं है, कि निष्काम कर्मयोग की अपेक्षा भक्ति श्रेष्ठ है। क्योंकि आगे बारहवें अध्याय में भगवान ने ही स्पष्ट कह दिया है कि ध्यान की अपेक्षा कर्मफलत्याग श्रेष्ठ है (गी॰ 12.12)। निष्काम कर्म और भक्ति के समुच्चय को श्रेष्ठ कहना एक बात है और सब निष्काम कर्मयोग को व्यर्थ कह कर, भक्ति ही को श्रेष्ठ बतलाना दूसरी बात है। गीता का सिद्धान्त पहले ढंग का है और भागवतपुराण का पक्ष दूसरे ढंग का है। भागवत (1.5.34) में सब प्रकार के क्रियायोग को आत्म-ज्ञान-विघातक निश्चित कर, कहा है – नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्। नैष्कर्म्य अर्थात् निष्काम कर्म भी (भाग॰ 11.3.46) बिना भगवद्भक्ति के शोभा नहीं देता, वह व्यर्थ है (भाग॰ 1.5.12 और 12.12.52)। इससे व्यक्त होगा, कि भागवतकार का ध्यान केवल भक्ति के ही ऊपर होने के कारण वे विशेष प्रसंग पर भगवद्गीता के भी आगे कैसी चौकड़ी भरते हैं। जिस पुराण का निरूपण इस समझ से किया गया है, कि महाभारत में और इससे गीता में भी भक्ति का जैसा वर्णन होना चाहिए वैसा नहीं हुआ, उसमें यदि उक्त वचनों के समान और भी कुछ बातें मिलें, तो कोई आश्चर्य नहीं। पर हमें तो देखना है गीता का तात्पर्य, न कि भागवत का कथन। दोनों का प्रयोजन और समय भी भिन्न-भिन्न है; इस कारण बात-बात में उनकी एकवाक्यता करना उचित नहीं है। कर्मयोग की साम्यबुद्धि प्राप्त करने के लिए जिन साधनों की आवश्यकता है, उनमें से पातंजल-योग को साधनों को इस अध्याय से इनके निरूपण का आरम्भ होगा।

— Lokmanya Tilak

अध्याय ६, श्लोक ६.४७