मूल श्लोक
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म न चिरेणाधिगच्छति ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
saṃnyāsastu mahābāho duḥkhamāptumayogataḥ yogayukto munirbrahma na cireṇādhigacchati
अनुवाद
हे महाबाहु! योग अर्थात् कर्म के बिना संन्यास को प्राप्त कर लेना कठिन है। जो मुनि कर्मयोग-युक्त हो गया, उसे ब्रह्म की प्राप्ति होने में विलम्ब नहीं लगता।
टिप्पणी
सातवें अध्याय से लेकर सत्रहवें अध्याय तक इस बात का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है, कि सांख्यमार्ग से मोक्ष मिलता है, वही कर्मयोग से अर्थात् कर्मों के न छोड़ने पर भी मिलता है। यहाँ तो इतना ही कहना है, कि मोक्ष की दृष्टि से दोनों में कुछ फर्क नहीं है, इस कारण अनादि काल से चलते आए हुए इन मार्गों का भेद-भाव बढ़ा कर झगड़ा करना उचित नहीं है; और आगे भी यही युक्ति पुनः पुनः आई हैं (गी॰ 2 और 18.1, 2 एवं उनकी टिप्पणी देखो)। 'एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति' यह श्लोक कुछ शब्दभेद से महाभारत में भी दो बार आया है (शां॰ 305.16; 316.4)। संन्यासमार्ग में ज्ञान को प्रधान मान लेने पर भी उस ज्ञान की सिद्धि कर्म किए बिना नहीं होती; और कर्मयोग में यद्यपि कर्म किया करते है, तो भी वे ज्ञानपूर्वक होते है, इस कारण ब्रह्म-प्राप्ति में कोई बाधा नहीं होती (गी॰ 6.2); फिर इस झगड़े को बढ़ाने में क्या लाभ है, कि दोनों मार्ग भिन्न-भिन्न है? यदि कहा जाएँ, कि कर्म करना ही बन्धक है, तो अब बतलाते है कि वह आक्षेप भी निष्काम कर्म के विषय में नहीं किया जा सकता –
— Lokmanya Tilak