मूल श्लोक
श्रीभगवानुवाच ।संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
śrībhagavānuvāca saṃnyāsaḥ karmayogaśca niḥśreyasakarāvubhau tayostu karmasaṃnyāsātkarmayogo viśiṣyate
अनुवाद
श्रीभगवान ने कहा: कर्मसंन्यास और कर्मयोग दोनो निष्ठाएँ या मार्ग निःश्रेयस्कर अर्थात् मोक्ष प्राप्त करा देनेवाले है; परन्तु (अर्थात् मोक्ष की दृष्टि से दोनों की योग्यता समान होने पर भी) इन दोनों में कर्मसंन्यास की अपेक्षा कर्मयोग की योग्यता विशेष है।
टिप्पणी
उक्त प्रश्न और उत्तर दोनों निःसन्दिग्ध और स्पष्ट है। व्याकरण की दृष्टि से पहले श्लोक के 'श्रेय' शब्द का अर्थ अधिक प्रशस्त या बहुत अच्छा है। दोनों मार्गों के तारतम्य-भावविषयक अर्जुन के प्रश्न का ही यह उत्तर है कि 'कर्मयोगो विशिष्यते' – कर्मयोग की योग्यता विशेष है। तथापि यह सिद्धान्त सांख्यमार्ग को इष्ट नहीं है, क्योंकि उसका कथन है, कि ज्ञान के पश्चात सब कर्मों का स्वरूपतः संन्यास ही करना चाहिए; इस कारण इन स्पष्ट अर्थ वाले प्रश्नोत्तर की व्यर्थ की खींचातानी कुछ लोगों ने की है। जब यह खींचातानी करने पर भी निर्वाह न हुआ तब, उन लोगों ने यह तुर्रा लगाकर किसी प्रकार अपना समाधान कर लिया कि 'विशिष्यते' (योग्यता या विशेषता) पद से भगवान ने कर्मयोग की अर्थवादात्मक अर्थात् कोरी स्तुति कर दी है – असल में भगवान का ठीक अभिप्राय वैसा नहीं है! यदि भगवान का यह मत होता, कि ज्ञान के पश्चात कर्मों की आवश्यकता नहीं है, तो क्या वे अर्जुन को यह उत्तर नहीं दे सकते थे कि 'इन दोनों में संन्यास श्रेष्ठ है?' परन्तु ऐसा न करके उन्होंने दूसरे श्लोक के पहले चरण में बतलाया है, कि 'कर्मों का करना और छोड़ देना, ये दोनों मार्ग एक ही से मोक्षदाता है;' और आगे 'तु' अर्थात् 'परन्तु' पद का प्रयोग करके जब भगवान ने निःसन्दिग्ध विधान किया है, कि 'तयोः' अर्थात् इन दोनों मार्गों में कर्म छोड़ने के मार्ग की अपेक्षा कर्म करने का पक्ष ही अधिक प्रशस्त (श्रेय) है; तब पूर्णतया सिद्ध हो जाता है, कि भगवान को यही मत ग्राह्य है, कि साधनावस्था में ज्ञानप्राप्ति के लिए किए जाने वाले निष्काम कर्मों को ही, ज्ञानी पुरुष आगे सिद्धावस्था में भी लोकसंग्रह के अर्थ मरणपर्यन्त कर्तव्य समझकर करता रहे। यही अर्थ गीता 3.7 में वर्णित है, यही 'विशिष्यते' पद वहाँ है; और उसके अगले श्लोक में अर्थात् गीता 3.8 में ये स्पष्ट शब्द फिर भी है, कि 'अकर्म की अपेक्षा कर्म श्रेष्ठ है।' इसमें सन्देह नहीं, कि उपनिषदों में कई स्थलों पर (बृ॰ 4.4.22) वर्णन है, कि ज्ञानी पुरुष लोकैषणा और पुत्रैषणा प्रभृति न रखकर भिक्षा माँगते हुए घूमा करते हैं। परन्तु उपनिषदों में भी यह नहीं कहा, कि ज्ञान के पश्चात् यह एक ही मार्ग है – दूसरा नहीं है। अतः केवल उल्लिखित उपनिषद् वाक्य से ही गीता की एक-वाक्यता करना उचित नहीं है। गीता का यह कथन नहीं है, कि उपनिषदों में वर्णित यह संन्यासमार्ग मोक्षप्रद नहीं है; किन्तु यद्यपि कर्मयोग और संन्यास, दोनों मार्ग एक से ही मोक्षप्रद है, तथापि (अर्थात् मोक्ष की दृष्टि से दोनों का फल एक ही होने पर भी) जगत के व्यवहार का विचार करने पर गीता का यह निश्चित मत है, कि ज्ञान के पश्चात भी निष्काम बुद्धि से कर्म करते रहने का मार्ग ही अधिक प्रशस्त या श्रेष्ठ है। हमारा किया हुआ यह अर्थ गीता के बहुतेरे टीकाकारों को मान्य नहीं है; उन्होंने कर्मयोग को गौण निश्चित किया है। परन्तु हमारी समझ में ये अर्थ सरल नहीं है; और गीतारहस्य के ग्यारहवें प्रकरण (विशेषकर पृ. 304 – 312) में इसके कारणों का विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है; इस कारण यहाँ उसके दुहराने की आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार दोनों में से अधिक प्रशस्त मार्ग का निर्णय कर दिया गया, अब यह सिद्ध कर दिखलाते है, कि ये दोनों मार्ग व्यवहार में यदि लोगों को भिन्न देख पड़े, तो भी तत्त्वतः वे दो नहीं हैं –
— Lokmanya Tilak