मूल श्लोक
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
nādatte kasyacitpāpaṃ na caiva sukṛtaṃ vibhuḥ ajñānenāvṛtaṃ jñānaṃ tena muhyanti jantavaḥ
अनुवाद
विभु अर्थात् सर्व्यापी आत्मा या परमेश्वर किसी का पाप और किसी का पुण्य भी नहीं लेता। ज्ञान पर अज्ञान का पर्दा पड़ा रहने का कारण (अर्थात् माया से) प्राणी मोहित हो जाते है।
टिप्पणी
इन दोनों श्लोकों का तत्त्व असल में सांख्यशास्त्र का है (गीतार॰ पृ. 162 – 165), वेदान्तियों के मत में आत्मा का अर्थ परमेश्वर है, अतः वेदान्ती लोग परमेश्वर के विषय में भी 'आत्मा अकर्ता है' इस तत्त्व का उपयोग करते है। प्रकृति और पुरुष ऐसे दो मूल तत्त्व मानकर सांख्यमतवादी समग्र कर्तृत्व प्रकृति का मानते है और आत्मा को उदासीन कहते है। परन्तु वेदान्ती लोक इसके आगे बढ़ कर यह मानते है कि इन दोनों ही का मूल एक निर्गुण परमेश्वर है और वह सांख्यवालों के आत्मा के समान उदासीन और अकर्ता है एवं सारा कर्तृत्व माया (अर्थात् प्रकृति) का है (गीतार॰ पृ. 267)। अज्ञान के कारण साधारण मनुष्य को ये बातें जान नहीं पड़ती; परन्तु कर्मयोगी कर्तृत्व और अकर्तृत्व का भेद जानता है, इस कारण वह कर्म करके भी अलिप्त ही रहता है; अब यही कहते है –
— Lokmanya Tilak