मूल श्लोक
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
sarvakarmāṇi manasā saṃnyasyāste sukhaṃ vaśī navadvāre pure dehī naiva kurvanna kārayan
अनुवाद
सब कर्मों का मन से (प्रत्यक्ष नहीं) संन्यास कर, जितेन्द्रिय देहवान् (पुरुष) नौ द्वारों के इस (देहरूपी) नगर में न कुछ करता और न कराता हुआ आनन्द से पड़ा रहता है।
टिप्पणी
वह जानता है, कि आत्मा अकर्ता है, खेल तो सब प्रकृति का है और इस कारण स्वस्थ या उदासीन पड़ा रहता है (गीता. 13.20 और 18.59 देखो)। दोनों आँखें, दोनो कान, नासिका के दोनों छि द्र, मुख, मूत्रेन्द्रिय और गुद – ये शरीर के नौ द्वार या दरवाजे समझे जाते है। अध्यात्म दृष्टि से यही उपपत्ति बतलाते है, कि कर्मयोगी कर्मों को करके भी युक्त कैसे बना रहता है –
— Lokmanya Tilak