भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ५.१३ ·

English

मूल श्लोक

सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

sarvakarmāṇi manasā saṃnyasyāste sukhaṃ vaśī navadvāre pure dehī naiva kurvanna kārayan

५.१३अध्याय ५ · संन्यासयोग२९ में से श्लोक १३

अनुवाद

सब कर्मों का मन से (प्रत्यक्ष नहीं) संन्यास कर, जितेन्द्रिय देहवान् (पुरुष) नौ द्वारों के इस (देहरूपी) नगर में न कुछ करता और न कराता हुआ आनन्द से पड़ा रहता है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

वह जानता है, कि आत्मा अकर्ता है, खेल तो सब प्रकृति का है और इस कारण स्वस्थ या उदासीन पड़ा रहता है (गीता. 13.20 और 18.59 देखो)। दोनों आँखें, दोनो कान, नासिका के दोनों छि द्र, मुख, मूत्रेन्द्रिय और गुद – ये शरीर के नौ द्वार या दरवाजे समझे जाते है। अध्यात्म दृष्टि से यही उपपत्ति बतलाते है, कि कर्मयोगी कर्मों को करके भी युक्त कैसे बना रहता है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ५, श्लोक ५.१३