मूल श्लोक
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथाऽपरे ।प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
apāne juhvati prāṇaṃ prāṇe'pānaṃ tathā'pare prāṇāpānagatī ruddhvā prāṇāyāmaparāyaṇāḥ
अनुवाद
प्राणायाम में तत्पर होकर प्राण और अपान की गति को रोक करके, कोई प्राणवायु का अपान में (हवन किया करते हैं) और कोई अपानवायु का प्राण में हवन किया करते है।
टिप्पणी
इस श्लोक का तात्पर्य यह है कि पातंजल-योग के अनुसार प्राणायाम करना भी एक यज्ञ ही है। यह पातंजल-योग-रूप यज्ञ उनतीसवें श्लोक में बतलाया गया है, अतः अट्ठाईसवें श्लोक के 'योगरूप यज्ञ' पद का अर्थ कर्मयोगरूपी यज्ञ करना चाहिए। प्राणायाम शब्द के प्राण शब्द से श्वास और उच्छ्वास, दोनों क्रियाएँ प्रगट होती है, परन्तु जब प्राण और अपान का भेद करना होता है तब, प्राण = बाहर जाने वाली अर्थात् उच्छ्वास वायु तथा अपान = भीतर आने वाली श्वास, यह अर्थ लिया जाता है (वे॰ सू॰ शांभा॰ 2.4.12 और छान्दोग्य शांभा॰ 1.2.3)। ध्यान रहे कि प्राण और अपान के ये अर्थ प्रचलित अर्थ से भिन्न हैं। इस अर्थ से अपान में, अर्थात् भीतर खींची हुई श्वास में, प्राण का – उच्छ्वास का – होम करने से पूरक नाम का प्राणायाम होता है;और इसके विपरीत प्राण में अपान को होम करने से रेचक प्राणायाम होता है। प्राण और अपान दोनों के ही निरोध से वही प्राणायाम कुम्भक हो जाता है। अब इसके सिवा ध्यान, उदान और समान ये तीनों बच रहे। इसमें से व्यान प्राण और अपान के सन्धि स्थलों में रहता है, जो धनुष खींचने, वजन उठाने आदि दम खींच कर या आधी श्वास छोड़कर शक्ति के काम करते समय व्यक्त होता है (छां॰ 1.3.5)। मरण-समय में निकल जाने वाली वायु को उदान कहते है (प्रश्न॰ 3.6), और सारे शरीर में सब स्थानों पर एक-सा अन्नरस पहुँचाने वाली वायु को समान कहते है (प्रश्न॰ 3.5)। इस प्रकार वेदान्तशास्त्र के इन शब्दों के सामान्य अर्थ दिए गए हैं; परन्तु कुछ स्थलों पर इसकी अपेक्षा निराले अर्थ अभिप्रेत होते हैं। उदाहरणार्थ, महाभारत (वनपर्व) के 212 वें अध्याय में प्राण आदि वायु के निराले ही लक्षण है, उसमें प्राण का अर्थ मस्तक की वायु और अपान का अर्थ नीचे सरकने वाली वायु है (प्रश्न॰ 3.5 और मैत्र्यु॰ 2.6)। ऊपर के श्लोक में जो वर्णन है, उसका यह अर्थ है कि इनमें से जिस वायु का निरोध करते हैं, उसका अन्य वायु में होम होता है।
— Lokmanya Tilak