मूल श्लोक
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
evaṃ buddheḥ paraṃ buddhvā saṃstabhyātmānamātmanā jahi śatruṃ mahābāho kāmarūpaṃ durāsadam
अनुवाद
हे महाबाहु अर्जुन! इस प्रकार (जो) बुद्धि से परे है उसको पहचान कर और अपने आपको रोककर दुरासाध्य कामरूपी शत्रु को तू मार डाल।
टिप्पणी
कामरूपी आसक्ति को छोड़कर स्वधर्म के अनुसार लोकसंग्रहार्थ समस्त कर्म करने के लिए इन्द्रियों पर अपनी सत्ता होनी चाहिए; वे अपने काबू में रहें बस, यहाँ इतना ही इन्द्रिय-निग्रह विवक्षित है। यह अर्थ नहीं है कि इन्द्रियों को जबरदस्ती से एकदम मार करके सारे कर्म छोड़ दे (देखो गीतार॰ पृ. 114)। गीतारहस्य (परि॰ पृ. 526) में दिखलाया गया है कि 'इन्द्रियाणि पराण्याहुः.' इत्यादि 42 वाँ श्लोक कठोपनिषद् का है और उपनिषद् के अन्य चार-पाँच श्लोक भी गीता में लिए गए है। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार का यह तात्पर्य है कि बाह्य पदार्थों के संस्कार ग्रहण करना इन्द्रियों का काम है, मन का काम इनकी व्यवस्था करना है, और फिर बुद्धि इनको अलग-अलग छाँटती है, एवं आत्मा इन सब से परे है तथा सब-से भिन्न है। इस विषय का विस्तारपूर्वक विचार गीतारहस्य के छठे प्रकरण के अन्त (पृ. 131 – 148) में किया गया है। कर्म-विपाक के ऐसे गूढ प्रश्नों का विचार, गीतारहस्य के दसवें प्रकरण (पृ. 227 – 285) में किया गया है, कि अपनी इच्छा न रहने पर भी मनुष्य काम-क्रोध आदि प्रवृत्ति-धर्मों के कारण कोई काम करने में क्योंकर प्रवृत्त हो जाता है; और आत्मस्वतन्त्रता के कारण इन्द्रियनिग्रहरूप साधन के द्वारा इससे छुटकारा पाने का मार्ग कैसे मिल जाता है। गीता के छठे अध्याय में विचार किया गया है, कि इन्द्रिय-निग्रह कैसे करना चाहिए।
— Lokmanya Tilak