भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.६५ ·

English

मूल श्लोक

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

prasāde sarvaduḥkhānāṃ hānirasyopajāyate prasannacetaso hyāśu buddhiḥ paryavatiṣṭhate

२.६५अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक ६५

अनुवाद

चित्त प्रसन्न रहने से उसके सब दुःखों का नाश होता है, क्योंकि जिसका चित्त प्रसन्न है उसकी बुद्धि भी तत्काल स्थिर होती है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इन दो श्लोकों में स्पष्ट वर्णन है कि विषय या कर्म को न छोड़ स्थितप्रज्ञ केवल उनका संग छोड़ कर विषय में ही निःसंग बुद्धि से बर्ता रहता है और उसे जो शान्ति मिलती है, वह कर्मयोग से नहीं किन्तु फलाशा के त्याग से प्राप्त होती है। क्योंकि इसके सिवा, अन्य बातों में इस स्थितप्रज्ञ में और संन्यास-मार्गवाले स्थितप्रज्ञ में कोई भेद नहीं है। इन्द्रियसंयमन, निरिच्छा और शान्ति ये गुण दोनों को ही चाहिए; परन्तु इन दोनों में महत्त्व का भेद यह है कि गीता का स्थितप्रज्ञ कर्मों का संन्यास नहीं करता किन्तु लोक-संग्रह के निमित्त समस्त कर्म निष्काम बुद्धि से किया करता है और संन्यासमार्ग-वाला स्थितप्रज्ञ करता ही नहीं है (देखो गी॰ 3.25)। किन्तु गीता के संन्यासमार्गीय टीकाकार इस भेद को गौण समझकर साम्प्रदायिक आग्रह से प्रतिपादन किया करते है, कि स्थितप्रज्ञ का उक्त वर्णन संन्यासमार्ग का ही है। अब इस प्रकार जिसका चित्त प्रसन्न नहीं, उसका वर्णन कर स्थितप्रज्ञ के स्वरूप को और भी अधिक व्यक्त करते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.६५