भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १८.२२ ·

English

मूल श्लोक

यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन् कार्ये सक्तमहैतुकम् ।अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

yattu kṛtsnavadekasmin kārye saktamahaitukam atattvārthavadalpaṃ ca tattāmasamudāhṛtam

१८.२२अध्याय १८ · मोक्षसंन्यासयोग७८ में से श्लोक २२

अनुवाद

परन्तु जो निष्कारण और तत्त्वार्थ को बिना जाने बूझे एक ही बात में यह समझ कर आसक्त रहता है, कि यही सब कुछ है, वह अल्प ज्ञान तामस कहा गया है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

भिन्न-भिन्न ज्ञानों के लक्षण बहुत व्यापक हैं। अपने बाल-बच्चों और स्त्री को ही सारा संसार समझना तामस ज्ञान है। इसके कुछ ऊँची सीढ़ी पर पहुँचने से दृष्टि अधिक व्यापक होती जाती है और अपने गाँव का अथवा देश का मनुष्य भी अपना-सा जँचने लगता है, तो भी यह बुद्धि बनी ही रहती है कि भिन्न-भिन्न गाँवों अथवा देशों के लोग भिन्न-भिन्न है। यही ज्ञान राज कहलाता है। परन्तु इससे ऊँचे जाकर प्राणिमात्र में एक ही आत्मा को पहचानना पूर्ण और सात्त्विक ज्ञान है। सार यह हुआ कि 'विभक्त में अविभक्त' अथवा 'अनेकता में एकता' को पहचानना ही ज्ञान का सच्चा लक्षण है। और, बृहदारण्यक एवं कठोपनिषदों के वर्णनानुसार जो यह पहचान लेता है, कि इस जगत में नानात्व नहीं है – 'नेह नानास्ति किंचन' वह मुक्त हो जाता है; परन्तु जो इस जगत में अनेकता देखता है, वह जन्म-मरण के चक्कर में पड़ा रहता है - 'मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति' (बृ॰ 4.4.19; कठ॰ 4.11)। इस जगत में जो कुछ ज्ञान प्राप्त करना है, वह यही है (गी॰ 13.16), और ज्ञान की यही परम सीमा है; क्योंकि सभी के एक हो जाने पर फिर एकीकरण की ज्ञान-क्रिया को आगे बढ़ने के लिए स्थान ही नहीं रहता (देखो गीतार॰ पृ. 232 – 233)। एकीकरण करने की इस ज्ञान-क्रिया का निरूपण गीतारहस्य के नवें प्रकरण (पृ. 214 – 216) में किया गया है। जब यह सात्विक ज्ञान मन में भली भाँति प्रतिबिम्बित हो जाता है, तब मनुष्य के देह-स्वभाव पर उसके कुछ परिणाम होते है। इन्हीं परिणामों का वर्णन दैवी-सम्पत्ति गुणवर्णन के नाम से सोलहवें अध्याय के आरम्भ में किया गया है। और तेरहवें अध्याय (13.7 – 11) में ऐसे देह-स्वभाव का नाम ही 'ज्ञान' बतलाया है। इससे जान पड़ता है कि 'ज्ञान' शब्द से (1) एकीकरण का मानसिक क्रिया की पूर्णता, तथा (2) उस पूर्णता का देह-स्वभाव पर होनेवाला परिणाम – ये दोनों अर्थ गीता में विवक्षित हैं। अतः बीसवें श्लोक में वर्णित ज्ञान का लक्षण यद्यपि बाह्यतः मानसिक क्रियात्मक दिखाई देता है, तथापि उसी में इस ज्ञान के कारण देह-स्वभाव पर होनेवाले परिणाम का भी समावेश करना चाहिए। यह बात गीतारहस्य के नवें प्रकरण के अन्त ( पृ. 247 – 248) में स्पष्ट कर दी गई है। अस्तु; ज्ञान के भेद हो चुके। अब कर्म के भेद बतलाए जाते है–

— Lokmanya Tilak

अध्याय १८, श्लोक १८.२२