भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १७.२८ ·

English

मूल श्लोक

अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

aśraddhayā hutaṃ dattaṃ tapastaptaṃ kṛtaṃ ca yat asadityucyate pārtha na ca tatpretya no iha

१७.२८अध्याय १७ · श्रद्धात्रयविभागयोग२८ में से श्लोक २८

अनुवाद

अश्रद्धा से जो हवन किया हो, (दान) दिया हो, तप किया हो, या जो कुछ (कर्म) किया हो, वह 'असत्' कहा जाता है। हे पार्थ! वह (कर्म) न मरने पर (परलोक में), और न इस लोक में हितकारी होता है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

तात्पर्य यह है कि ब्रह्मस्वरूप के बोधक इस सर्वमान्य संकल्प में ही निष्काम बुद्धि से, अथवा कर्तव्य समझ कर किए हुए सात्त्विक कर्म का, और शास्त्रानुसार सद्बुद्धि से किए हुए प्रशस्त कर्म अथवा सत्कर्म का समावेश होता है। अन्य सब कर्म वृथा हैं। इससे सिद्ध होता है कि उस कर्म को छोड़ देने का उपदेश करना उचित नहीं है, कि जिस कर्म का ब्रह्मनिर्देश में ही समावेश होता है, और जो ब्रह्मदेव के साथ ही उत्पन्न हुआ है (गी॰ 3.10), तथा जो किसी से छूट भी नहीं सकता। 'ॐ तत्सत्'-रूपी ब्रह्मनिर्देश के उक्त कर्मयोग-प्रधान अर्थ को, इसी अध्याय में कर्मविभाग के साथ ही, बतलाने का हेतु भी यही है। क्योंकि केवल ब्रह्मस्वरूप का वर्णन तो तेरहवें अध्याय में और उसके पहले भी हो चुका है। गीतारहस्य के नवें प्रकरण के अन्त (पृ. 245) में बतला चुके है कि 'ॐ तत्सत्' पद का असली अर्थ क्या होना चाहिए। आज-कल 'सच्चिदानन्द' पद से ब्रह्मनिर्देश करने की प्रथा है। परन्तु इसको स्वीकार न करके यहाँ जब उस 'ॐ तत्सत्' ब्रह्मनिर्देश का ही उपयोग किया गया है, तब इससे यह अनुमान निकल सकता है कि 'सच्चिदानन्द' पदरूपी ब्रह्म-निर्देश गीता ग्रन्थ के निर्मित हो चुकने पर साधारण ब्रह्मनिर्देश के रूप से प्रायः प्रचलित हुआ होगा।

— Lokmanya Tilak

अध्याय १७, श्लोक १७.२८