मूल श्लोक
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
manaḥprasādaḥ saumyatvaṃ maunamātmavinigrahaḥ bhāvasaṃśuddhirityetattapo mānasamucyate
अनुवाद
मन को प्रसन्न रखना, सौम्यता, मौन अर्थात् मुनियों के समान वृत्ति रखना, मनोनिग्रह और शुद्ध भावना – इनको मानस तप कहते हैं।
टिप्पणी
जान पड़ता है कि पन्द्रहवें श्लोक में सत्य, प्रिय और हित तीनों शब्द मनु के इस वचन को लक्ष्य कर कहे गए है – 'सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्। प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥' (मनु॰ 4.138) – यह सनातन धर्म है कि सच और मधुर (तो) बोलना चाहिए, परन्तु अप्रिय सच न बोलना चाहिए। तथापि महाभारत में ही विदुर ने दुर्योधन से कहा है कि 'अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः' (देखो सभा॰ 63.17)। अब कायिक, वाचिक और मानसिक तपों के जो भेद फिर भी होते है, वे यों है –
— Lokmanya Tilak