भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १७.१ ·

English

मूल श्लोक

अर्जुन उवाच ।ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः ।तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

arjuna uvāca ye śāstravidhimutsṛjya yajante śraddhayā'nvitāḥ teṣāṃ niṣṭhā tu kā kṛṣṇa sattvamāho rajastamaḥ

१७.१अध्याय १७ · श्रद्धात्रयविभागयोग२८ में से श्लोक १

अनुवाद

अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण! जो लोग श्रद्धा से युक्त होकर, शास्त्र-निर्दिष्ट विधि को छोड़ करके यजन करते है, उनकी निष्ठा अर्थात् (मन की) स्थिति कैसी है – सात्त्विक है, या राजस है, या तामस?

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

पिछले अध्याय के अन्त में जो यह कहा गया था, कि शास्त्र की विधि का अथवा नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए; उसी पर अर्जुन ने यह शंका की है। शास्त्रों पर श्रद्धा रखते हुए भी मनुष्य अज्ञान से भूल कर बैठता है। उदाहरणार्थ, शास्त्र-विधि यह है कि सर्व्यापी परमेश्वर का भजन-पूजन करना चाहिए; परन्तु वह इसे छोड़ देवताओं की धुन में लग जाता है (गी, 9.23)। अतः अर्जुन का प्रश्न है कि ऐसे पुरुष की निष्ठा अर्थात् अवस्था अथवा स्थिति कौन सी समझी जावें। यह प्रश्न उन आसुरी लोगों के विषय में नहीं है, कि जो शास्त्र का और धर्म का अश्रद्धापूर्वक तिरस्कार किया करते है। तो भी इस अध्याय में प्रसंगानुसार उनके कर्मों के फल का भी वर्णन किया गया है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय १७, श्लोक १७.१