मूल श्लोक
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
āsurīṃ yonimāpannā mūḍhā janmani janmani māmaprāpyaiva kaunteya tato yāntyadhamāṃ gatim
अनुवाद
हे कौन्तेय! (इस प्रकार) जन्म-जन्म में आसुरी योनि को ही पा कर, ये मूर्ख लोग मुझे बिना पाए ही अन्त में अत्यन्त अधोगति को जा पहुँचते है।
टिप्पणी
आसुरी लोगों का और उनको मिलने वाली गति का वर्णन हो चुका। अब इससे छुटकारा पाने की युक्ति बतलाते है –
— Lokmanya Tilak