भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १५.१३ ·

English

मूल श्लोक

गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

gāmāviśya ca bhūtāni dhārayāmyahamojasā puṣṇāmi cauṣadhīḥ sarvāḥ somo bhūtvā rasātmakaḥ

१५.१३अध्याय १५ · पुरुषोत्तमयोग२० में से श्लोक १३

अनुवाद

इसी प्रकार पृथ्वी में प्रवेश कर मैं ही (सब) भूतों को अपने तेज से धारण करता हूँ, और रसात्मक सोम (चन्द्रमा) होकर सब औषधियों का अर्थात् वनस्पतियों को पोषण करता हूँ।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

सोम शब्द के 'सोमवल्ली' और 'चन्द्र' अर्थ है; तथा वेदों में वर्णन है, कि चन्द्र जिस प्रकार जलात्मक, अंशुमान् और शुभ्र है, उसी प्रकार सोमवल्ली भी है, दोनों ही को 'वनस्पतियों का राजा' कहा है, तथापि पूर्वापर सन्दर्भ से यहाँ चन्द्र ही विवक्षित है। इस श्लोक में यह कह कर, कि चन्द्र का तेज मैं ही हूँ, फिर इसी श्लोक में बतलाया है कि वनस्पतियों का पोषण करने का चन्द्र का जो गुण है, वह भी मैं ही हूँ। अन्य स्थानों में भी ऐसे वर्णन है कि जलमय होने से चन्द्र में यह गुण है, इसी कारण वनस्पतियों की बाढ़ होती है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय १५, श्लोक १५.१३