भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ११.४४ ·

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मूल श्लोक

तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायम्प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युःप्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

tasmātpraṇamya praṇidhāya kāyam prasādaye tvāmahamīśamīḍyam piteva putrasya sakheva sakhyuḥ priyaḥ priyāyārhasi deva soḍhum

११.४४अध्याय ११ · विश्वरूपदर्शनयोग५५ में से श्लोक ४४

अनुवाद

तुम्हीं स्तुत्य और समर्थ हो; इसलिए मैं शरीर झुका कर नमस्कार करके तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि 'प्रसन्न हो जाओ।' जिस प्रकार पिता अपने पुत्र के अथवा सखा अपने सखा के अपराध क्षमा करता है, उसी प्रकार हे देव! प्रेमी (आप) को प्रिय के (अपने प्रेमपात्र के अर्थात् मेरे, सब) अपराध क्षमा करना चाहिए।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

कुछ लोग 'प्रियः प्रियायार्हसि' इन शब्दों का 'प्रिय पुरुष जिस प्रकार अपनी स्त्री के' ऐसा अर्थ करते है। परन्तु हमारे मत में यह ठीक नहीं है। क्योंकि व्याकरण की रीति से 'प्रियायार्हसि' के प्रियायाः + अर्हसि अथवा प्रियायै + अर्हसि ऐसे पद नहीं टूटता, और उपमा-द्योतक 'इव' शब्द भी इस श्लोक में दो बार ही आया है। अतः 'प्रियः प्रियायार्हसि' को तीसरी उपमा न समझकर उपमेय मानना ही अधिक प्रशस्त है। 'पुत्र के' (पुत्रस्य), 'सखा के' (सख्युः), इन दोनों उपमानात्मक षष्ठ्यन्त शब्दों के समान यदि उपमेय में भी 'प्रियस्य' (प्रिय के) यह षष्ठ्यन्त पद होता, तो बहुत अच्छा होता। परन्तु अब 'स्थि तस्य गतिश्चिन्तनीया' इस न्याय के अनुसार यहाँ व्यवहार करना चाहिए। हमारी समझ में यह बात बिलकुल युक्तिसंगत नहीं देख पड़ती, कि 'प्रियस्य' इस षष्ठ्यन्त स्त्रीलिंग पद के अभाव में, व्याकरण के विरुद्ध 'प्रियायाः' यह षष्ठ्यन्त स्त्रीलिंग का पद किया जावें; और जब वह पद अर्जुन के लिए लागू न हो सके तब, 'इव' शब्द को अध्याहार मान कर 'प्रियः प्रियायाः' – प्रेमी अपनी प्यारी स्त्री के – ऐसी तीसरी उपमा मानी जावे, और वह भी शृंगारिक अतएव अप्रासंगिक हो। इसके सिवा, एक और बात है, कि पुत्रस्य, सख्युः, प्रियायाः, इन तीनों पदों के उपमान में चले जाने से उपमेय में षष्ठ्यन्त पद बिलकुल ही नहीं रह जाता, और 'मे अथवा मम' पद का फिर भी अध्याहार करना पड़ता है; एवं इतनी माथापच्ची करने पर उपमान और उपमेय में जैसे-तैसे विभक्ति की समता हो गई, तो दोनों में लिंग की विषमता का नया दोष बना ही रहता है। दूसरे पक्ष में अर्थात् प्रियाय + अर्हसि ऐसे व्याकरण की रीति से शुद्ध और सरल पद किए जाएँ तो उपमेय में यहाँ षष्ठी होनी चाहिए, वहाँ 'प्रियाय' यह चतुर्थी आती है, - बस इतनी ही दोष रहता है, और यह दोष कोई विशेष महत्त्व का नहीं है। क्योंकि षष्ठी का अर्थ यहाँ चतुर्थी का सा है और अन्यत्र भी कई बार ऐसा होता है। इस श्लोक का अर्थ परमार्थ प्रपा टीका में वैसा ही है, जैसा कि हमने किया है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय ११, श्लोक ११.४४