मूल श्लोक
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
manyase yadi tacchakyaṃ mayā draṣṭumiti prabho yogeśvara tato me tvaṃ darśayātmānamavyayam
अनुवाद
हे प्रभो! यदि तुम समझते हो, कि उस प्रकार का रूप मैं देख सकता हूँ, तो हे योगेश्वर! तुम अपना अव्यय स्वरूप मुझे दिखलाओ।
टिप्पणी
सातवें अध्याय में ज्ञान-विज्ञान का आरम्भ कर, सातवें और आठवें में परमेश्वर के अक्षर अथवा अव्यक्त रूप का तथा नवें एवं दसवें में अनेक व्यक्त रूपों का जो ज्ञान बतलाया है, उसे ही अर्जुन ने पहले श्लोक में 'अध्यात्म' कहा है। एक अव्यक्त से अनेक व्यक्त पदार्थों के निर्मित होने का जो वर्णन सातवें (4 – 15), आठवें (16 – 21), और नवें (4 – 8) अध्यायों में है, वही 'भूतों की उत्पत्ति और लय' इन शब्दों से दूसरे श्लोक में अभिप्रेत है। तीसरे श्लोक के दोनों अर्धांशों को दो भिन्न-भिन्न वाक्य मान कर कुछ लोग उसका ऐसा अर्थ करते है, कि 'परमेश्वर! तुमने अपना जैसा (स्वरूप का) वर्णन किया वह सत्य है (अर्थात् मैं समझ गया); अब हे पुरुषोत्तम! मैं तुम्हारे ईश्वरी स्वरूप को देखना चाहता हूँ' (देखो गी॰ 10.14)। परन्तु दोनों पंक्ति यों को मिलाकर एक वाक्य मानना ठीक जान पड़ता है और परमार्थप्रपा टीका में ऐसा किया भी गया है। चौथे श्लोक में जो 'योगेश्वर' शब्द है, उसका अर्थ योगों का (योगियों का नहीं) ईश्वर है (18.75)। योग का अर्थ पहले (गी॰ 7.25 और 9.5) अव्यक्त रूप से व्यक्त सृष्टि निर्माण करने का सामर्थ्य अथवा युक्ति किया जा चुका है; अब उस सामर्थ्य से ही विश्वरूप दिखलाना है, इस कारण यहाँ 'योगेश्वर' सम्बोधन का प्रयोग सहेतुक है।
— Lokmanya Tilak