भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ११.३७ ·

English

मूल श्लोक

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

kasmācca te na nameranmahātman garīyase brahmaṇo'pyādikartre ananta deveśa jagannivāsa tvamakṣaraṃ sadasattatparaṃ yat

११.३७अध्याय ११ · विश्वरूपदर्शनयोग५५ में से श्लोक ३७

अनुवाद

हे महात्मन्! तुम ब्रह्मदेव के भी आदिकारण और उससे श्रेष्ठ हो; तुम्हारी वन्दना वे कैसे न करेंगे? हे अनन्त! हे देवदेव! हे जगन्निवास! सत् और असत् तुम्हीं हो, और इन दोनों से परे जो अक्षर है वह भी तुम्हीं हो!

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

गीता 7.24; 8.20 और 15.16 से देख पड़ेगा, कि सत् और असत् शब्दों के अर्थ वहाँ पर क्रम से व्यक्त और अव्यक्त अथवा क्षर और अक्षर इन शब्दों के अर्थों के समान है। सत् और असत् से परे जो तत्त्व है, वही अक्षर ब्रह्म है; इसी कारण गीता 13.12 में स्पष्ट वर्णन है कि 'मैं न तो सत् हूँ और न असत्।' गीता में 'अक्षर' शब्द कभी प्रकृति के लिए और कभी ब्रह्म के लिए उपयुक्त होता है। गीता 9.19; 13.12 और 15.16 की टिप्पणी देखो।

— Lokmanya Tilak

अध्याय ११, श्लोक ११.३७