मूल श्लोक
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हिव्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।दृष्ट्वाऽद्भुतं रूपमुग्रं तवेदम्लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
dyāvāpṛthivyoridamantaraṃ hi vyāptaṃ tvayaikena diśaśca sarvāḥ dṛṣṭvā'dbhutaṃ rūpamugraṃ tavedam lokatrayaṃ pravyathitaṃ mahātman
अनुवाद
क्योंकि आकाश और पृथ्वी के बीच का यह (सब) अन्तर और सभी दिशाएँ अकेले तुम्हीं ने व्याप्त कर डाली हैं। हे महात्मन्! तुम्हारे इस अद्भुत और उग्र रूप को देख कर त्रैलोक्य (डर से) व्यथित हो रहा है।