भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १०.२५ ·

English

मूल श्लोक

महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

maharṣīṇāṃ bhṛgurahaṃ girāmasmyekamakṣaram yajñānāṃ japayajño'smi sthāvarāṇāṃ himālayaḥ

१०.२५अध्याय १० · विभूतियोग४२ में से श्लोक २५

अनुवाद

महर्षियों में मैं भृगु हूँ; वाणी में एकाक्षर अर्थात् ॐकार हूँ। यज्ञों में जप-यज्ञ मैं हूँ; स्थविर अर्थात् स्थिर पदार्थों में हिमालय हूँ।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

'यज्ञों में जपयज्ञ मैं हूँ' यह वाक्य महत्त्व का है। अनुगीता (मभा॰ अश्व॰ 44.8) में कहा है कि 'यज्ञानां हुतमुत्तमम्' अर्थात् यज्ञों में (अग्नि में) हवि समर्पण करके सिद्ध होनेवाला यज्ञ उत्तम है; और वही वैदिक कर्मकाण्ड वालों का मत है। पर भक्तिमार्ग में हविर्यज्ञ की अपेक्षा नाम-यज्ञ या जप-यज्ञ का विशेष महत्त्व है, इसी से गीता में 'यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि ' कहा है। मनु ने भी एक स्थान पर (2.87) कहा है कि 'और कुछ करें या न करें, केवल जप से ही ब्राह्मण सिद्धि पाता है।' भागवत में 'यज्ञानां ब्रह्मयज्ञोऽहं' पाठ है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय १०, श्लोक १०.२५