भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १०.११ ·

English

मूल श्लोक

तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

teṣāmevānukampārthamahamajñānajaṃ tamaḥ nāśayāmyātmabhāvastho jñānadīpena bhāsvatā

१०.११अध्याय १० · विभूतियोग४२ में से श्लोक ११

अनुवाद

और उनपर अनुग्रह करने के लिए ही मैं उनके आत्मभाव अर्थात् अन्तःकरण में पैठ कर तेजस्वी ज्ञान-दीप से (उनके) अज्ञानमूलक अन्धकार का नाश करता हूँ।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

सातवें अध्याय में कहा है, कि भिन्न-भिन्न देवताओं की श्रद्धा भी परमेश्वर देता है (7.21)। उसी प्रकार अब ऊपर के दसवें श्लोक में भी वर्णन है, कि भक्तिमार्ग में लगे हुए मनुष्य की समत्व बुद्धि को उन्नत करने का काम भी परमेश्वर ही करता है; और, पहले (गी॰ 6.44) जो यह वर्णन है, कि जब मनुष्य के मन में एक बार कर्मयोग की जिज्ञासा जागृत हो जाती है, तब वह आप ही आप पूर्ण सिद्धि की ओर खींचा चला जाता है, उसके साथ भक्तिमार्ग का यह सिद्धान्त समानार्थक है। ज्ञान की दृष्टि से अर्थात् कर्म-विपाक-प्रक्रिया के अनुसार कहा जाता है, कि यह कर्तृत्व आत्मा की स्वतन्त्रता से मिलता है। पर आत्मा भी तो परमेश्वर ही है; इस कारण भक्तिमार्ग में ऐसा वर्णन हुआ करता है, कि इस फल अथवा बुद्धि को परमेश्वर ही प्रत्येक मनुष्य के पूर्वकर्मों के अनुसार देता है (देखो गी॰ 7.20 और गीतार॰ पृ. 427)। इस प्रकार भगवान के भक्तिमार्ग का तत्त्व बतला चुकने पर –

— Lokmanya Tilak

अध्याय १०, श्लोक १०.११