मूल श्लोक
सञ्जय उवाच ।एवमुक्त्वाऽर्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
sañjaya uvāca evamuktvā'rjunaḥ saṅkhye rathopastha upāviśat visṛjya saśaraṃ cāpaṃ śokasaṃvignamānasaḥ
अनुवाद
संजय ने कहा: इस प्रकार रणभूमि में भाषण कर, शोक से व्यथितचित्त अर्जुन (हाथ का) धनुष्य-बाण डाल कर रथ में अपने स्थान पर यों ही बैठ गया!
टिप्पणी
रथ में खड़े होकर युद्ध करने की प्रणाली थी, अतः 'रथ में अपने स्थान पर बैठ गया' इन शब्दों से यही अर्थ अधिक व्यक्त होता है, कि खिन्न हो जाने के कारण युद्ध करने की उसे इच्छा न थी। महाभारत में कुछ स्थलों पर इन रथों का जो वर्णन है, उससे देख पड़ता है, कि भारतकालीन रथ प्रायः दो पहियों के होते थे; बड़े-बड़े रथों में चार-चार घोड़े जोते जाते थे और रथी एवं सारथी – दोनो अगले भाग में परस्पर एक दूसरे की आजू-बाजू मे बैठते थे। रथ की पहचान के लिए प्रत्येक रथ पर एक विशेष ध्वजा लगी रहती थी। यह बात प्रसिद्ध है कि अर्जुन की ध्वजा पर प्रत्यक्ष हनुमान ही बैठे थे।
— Lokmanya Tilak