भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १.४७ ·

English

मूल श्लोक

सञ्जय उवाच ।एवमुक्त्वाऽर्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

sañjaya uvāca evamuktvā'rjunaḥ saṅkhye rathopastha upāviśat visṛjya saśaraṃ cāpaṃ śokasaṃvignamānasaḥ

१.४७अध्याय १ · अर्जुनविषादयोग४७ में से श्लोक ४७

अनुवाद

संजय ने कहा: इस प्रकार रणभूमि में भाषण कर, शोक से व्यथितचित्त अर्जुन (हाथ का) धनुष्य-बाण डाल कर रथ में अपने स्थान पर यों ही बैठ गया!

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

रथ में खड़े होकर युद्ध करने की प्रणाली थी, अतः 'रथ में अपने स्थान पर बैठ गया' इन शब्दों से यही अर्थ अधिक व्यक्त होता है, कि खिन्न हो जाने के कारण युद्ध करने की उसे इच्छा न थी। महाभारत में कुछ स्थलों पर इन रथों का जो वर्णन है, उससे देख पड़ता है, कि भारतकालीन रथ प्रायः दो पहियों के होते थे; बड़े-बड़े रथों में चार-चार घोड़े जोते जाते थे और रथी एवं सारथी – दोनो अगले भाग में परस्पर एक दूसरे की आजू-बाजू मे बैठते थे। रथ की पहचान के लिए प्रत्येक रथ पर एक विशेष ध्वजा लगी रहती थी। यह बात प्रसिद्ध है कि अर्जुन की ध्वजा पर प्रत्यक्ष हनुमान ही बैठे थे।

— Lokmanya Tilak

अध्याय १, श्लोक १.४७