मूल श्लोक
सञ्जय उवाच ।दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
sañjaya uvāca dṛṣṭvā tu pāṇḍavānīkaṃ vyūḍhaṃ duryodhanastadā ācāryamupasaṅgamya rājā vacanamabravīt
अनुवाद
संजय ने कहा: उस समय पाण्डवों की सेना को व्यूह रचकर (खड़ी) देखकर, राजा दुर्योधन (द्रोण) आचार्य के पास गया और उसने कहने लगा कि –
टिप्पणी
महाभारत (मभा॰ भी.19.4 – 6; मनु॰ 7.191) के उन अध्यायों में, कि जो गीता से पहले लिखे गए है, यह वर्णन है कि जब कौरवों की सेना की भीष्म-द्वारा रचा हुआ व्यूह पांडवों ने देखा और जब उनको अपनी सेना कम देख पड़ी तब उन्होंने युद्धविद्या के अनुसार वज्र नामक व्यूह रचकर अपनी सेना खड़ी की। युद्ध में प्रतिदिन ये व्यूह बदला करते थे।
— Lokmanya Tilak